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अब  जब कोरोना मरीजों के लिये अतिरिक्त बेड उपलब्ध कराने का प्रश्न सामने खड़ा है तब सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन की आपूर्ति की है । पाइप लाइन से ऑक्सीजन की आपूर्ति संभव न होने पर ऑक्सीजन सिलेंडरों से मरीजों की जान बचाने की कोशिश जारी है । दरअसल, कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा असर शरीर में ऑक्सीजन के स्तर पर होता है। मरीजों को जिंदा रखने के लिये ऑक्सीजन की आपूर्ति सबसे ज्यादा जरूरी है।

 

१५ प्रतिशत कोरोना मरीजों में फेफड़े काम नहीं करते और उन्हें सांस लेने के लिये मदद की जरूरत होती है। कुछ मरीज ऐसे भी होते हैं जिन्हें सांस लेने में दिक्कत नहीं होती, मगर उनके शरीर में ऑक्सीजन की कमी चिंताजनक स्तर तक होती है।

हमारे देश में गांव-देहात में ऑक्सीजन की आपूर्ति बड़ी चुनौती है। ऐसे में सभी रोगियों के लिये ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करना  सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।कोरोना वायरस के प्रसार से उपजे वैश्विक संकट के मुकाबले के लिये एकीकृत रणनीतियों की सख्त जरूरत है।

संकट यह भी है कि कारखानों द्वारा अधिकांश ऑक्सीजन की सप्लाई सरकारी अस्पतालों को की जाती है, मगर उन्हें समय से इसका भुगतान नहीं किया जाता। जबकि चिकित्सा ऑक्सीजन के उत्पादन में पर्याप्त पूंजी और उन्नत तकनीक की जरूरत होती है। यही वजह है की हैंड सैनिटाइजर व मॉस्क उत्पादन के क्षेत्र में तो नये उद्यमी उतरे हैं, वैसे ऑक्सीजन उत्पादन का क्षेत्र इतना सरल भी नहीं है।

लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं और मौत का आंकड़ा भी लाख के करीब पहुंचने वाला है, ऑक्सीजन उपलब्धता सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है। इसके परिणाम शुभ हो, यही कामना है | 

वास्तव में कोविड संकट ने ऐसे वक्त पर चोट दी कि देश इस चुनौती के मुकाबले के लिए चिकित्सा संसाधनों और मानसिक रूप से तैयार न था। लॉकडाउन के दौरान चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और जरूरत के बीच तालमेल बनाने की कोशिश जरूर की गई।

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