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भुखमरी और कुपोषण को ख़तम करने के नाम पर आज कल कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय हैं।


उज्जैन : पोषण की बात हो रही है जबकि हकीकत यह है कि दुनिया की लगभग आधी आबादी भर पेट भोजन नहीं कर पाती। कोविड-19 के दौरान जहां पूरी दुनिया लगभग 100 दिनों से ज्यादा लाकडाउन में बंद रही वहीं भूख के बढ़ते आंकड़े ने मानवता को हिला कर रख दिया। भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में तेज वृद्धि की आशंका दिल दहला रही है। इसमें उज्जैन जैसा धार्मिक शहर भी शामिल है। भुखमरी और कुपोषण को ख़तम करने के नाम पर आज कल कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय हैं।

अनाज की इस तरह की प्रोसेसिंग में मात्रात्मक स्तर पर प्रतिवर्ष मनुष्यों के खाने योग्य 80 लाख टन अनाज का नुकसान होता है।

बाज़ार में मुनाफ़े के लिए खड़ी ये कम्पनियां भूख और कुपोषण के खिलाफ अनेक कार्यक्रम भी चला रही हैं। इनके खाद्य व्यवसाय में सक्रिय होने के बाद कुपोषण के मामले और बिगड़े ही हैं। ज्यों-ज्यों पोषण का सवाल मुखर रूप ले रहा है त्यों-त्यों बाजार के बताये उपाय गले की हड्डी बनते जा रहे हैं। चावल एक महत्वपूर्ण खाद्यान्‍न है लेकिन फूड प्रोसेसिंग उद्योगों ने चावल की अधिक पॉलिशिंग कर के उसके पोषक तत्वों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उल्लेखनीय है कि चावल को चमकदार और सुन्दर दिखाने के लिए उसके आवश्यक पोषण को प्रोसेसिंग में नष्ट कर दिया जाता है। अनाज की इस तरह की प्रोसेसिंग में मात्रात्मक स्तर पर प्रतिवर्ष मनुष्यों के खाने योग्य 80 लाख टन अनाज का नुकसान होता है।

आम जनता के स्तर पर ऐसी योजना की जानकारी के अभाव में लोगों को कोई साजिश नजर नहीं आती।

गुणात्मक स्तर पर तो इस नुकसान की गणना भी नहीं की जा सकती। कम्पनियों और बाजार का गठजोड़ हमारी प्राकृतिक खाद्य व्यवस्था को खत्म कर देने की योजना बना चुका है और हम उसके जाल में फंस चुके हैं। कई पोषक तत्व तो खाद्य में कृत्रिम रूप से डाले ही नहीं जा सकते। तेजी से विकसित होते खाद्य बाजार और इसके पीछे लगी बड़ी कम्पनियों की सफलता देखी जा सकती है। आम जनता के स्तर पर ऐसी योजना की जानकारी के अभाव में लोगों को कोई साजिश नजर नहीं आती। कम्पनियां भी मध्यम वर्ग के लोगों को प्रभावित करना अच्छी तरह से जानती हैं। वैश्वीकरण की इस थोपी गयी परिस्थिति में वैकल्पिक और जनवादी सोच रखने वाले समाज वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे जन चेतना और जनआन्दोलन को सकारात्मक दिशा दें ताकि इसके दुष्‍प्रभावों को मुकम्मल रूप से रोका जा सके  ।

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