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डर के साये में जीने को मजबूर नागरिक, व्यापारियों पर भी बनाया जा रहा दबाव

नागदा जं. निप्र। इसे विडम्बना ही कहा जाऐगा कि जिन नीतिकारों के भरोसे देश, प्रदेश एवं शहर के नागरिक अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं कोरोना संक्रमण के इस दौर में विगत पाॅंच माह से हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। कोरोना के डर एवं भय का आलम यह हो गया है कि प्रतिदिन आने वाले बुलेटिन का देर शाम से ही डरते-डरते हर कोई पुछता है कि आज कौन आया ? लेकिन न तो प्रशासनिक व्यवस्था में कोई बदलाव आया और ना ही स्वास्थ्य संबंधी कोई सही जानकारी शहरवासियों को दी गई। ले देकर सिर्फ एक ही बात हर मिटिंग में सुनाई देती है कि व्यापारीक प्रतिष्ठानों पर संक्रमण ज्यादा फैलने का डर है। जबकि अभी तक एक भी ऐसा मामला नही आया है जिसमें यह सही तरीके से सामने आया हो कि किसी व्यापारी प्रतिष्ठान पर सामान खरीदी के दौरान कोई नागरिक संक्रमित हुआ हो। प्रशासन आज भी मार्च माह के दौरान कहे जाने वाले उसी घीसे-पीटे राग को अलाप रहा है कि सोश्यल डिस्टेंसिंग का पालन करें, मास्क लगाऐ, लेकिन कोरोना से निपटने की न तो शासन के पास कोई नीति है और ना ही कोई दिशा। ऐसे में शहर के नागरिक पाॅंच माह का समय होने के बाद भी भय के वातावरण से बाहर नहीं आ पा रहे है, वहीं इस भय ने शहर के व्यापार-व्यवसाय को भी चोपट कर दिया है।

जनता कफ्र्यू के समय सोचा भी नहीं था कि ऐसा दौर आने वाला है

22 मार्च रविवार को जनता कफ्र्यू लगाने हेतु जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम संदेश में सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक जनता कफ्र्यू लागू किया था तथा शाम 5 बजे देशवासियों से ताली एवं थाली बजाने को कहा था तब इस देश के वाशिंदों ने सोचा भी नहीं था कि आने वाला दौर कितना खतरनाक होने वाला है। जनता कफ्र्यू का पुरे शहर ने पुरे दिन पालन किया, लेकिन जैसे ही 5 बजी एक ऐसा माहोल बना कि प्रत्येक घर से ताली और थाली की आवाजें गूंजी तब इसको लेकर कुछ तर्क भी दिए गए थे कि विशेष ध्वनि उत्पन्न होने से संभवतः वायरस खत्म हो जाऐ तब कोरोना संक्रमण का देश में आंकडा मात्र 360 था तथा 7 नागरिकों की जान गई थी। उसके बाद 25 मार्च की सुबह से कभी न भूले जाने वाला लाॅकडाउन लगा दिया गया जो पुरे 68 दिन तक लागू रहा, 1 जून से अॅनलाॅक की घोषणा की गई। हालांकि लाॅकडाउन के दौरान आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति हेतु भी प्रशासन ने आवश्यक छूट दी थी।

अॅनलाॅक के समय लाॅकडाउन कर दिया, लाॅकडाउन के समय अॅनलाॅक

कोरोना संक्रमण से निपटने हेतु सरकार, स्वास्थ्य विभाग तथा प्रशासन आखिर किस दिशा में कार्य कर रहा है यह समझ से परे है। जब देश में 360 संक्रमित थे तब लाॅकडाउन का फैसला लिया गया जिससे पुरे देश का व्यापार तो चोपट हुआ ही, वहीं संक्रमण भी नहीं थमा। लाॅक डाउन के समय सैकडों में आने वाली संख्या आज हजारों में तथा कल लाखों में पहुॅंचने की संभावना है। इसके साथ-साथ लाॅकडाउन की मुसीबतें कौन भूल सकता है। आज संक्रमण के आंकडों पर यदि गौर किया जाऐ तो 24 लाख संक्रमित हो चुके हैं। हालांकि बीना किसी वैक्सिन के ही देश में बिमारी से ठीक होने वालों का प्रतिशत काफी अधिक है, लेकिन खतरा अभी भी बना हुआ है, और इस खतरे को मात्र अंतराष्ट्रीय हवाई उडानों को प्रतिबंधित कर टाला भी जा सकता था, लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया।

कभी माॅडल बनने की राह पर था नागदा

कोरोना संक्रमण के प्रारंभिक दौर में शहर में सबसे पहला संक्रमित व्यक्ति 7 अप्रैल को मिला था, जो कि अन्यंत्र स्थान पर यात्रा कर नागदा पहुॅंचा था। उसके बाद एक माह में यह आंकडा लगभग एक दर्जन पहुॅंच गया था। लेकिन उसके बाद प्रशासनिक कसावट के चलते यह आंकडा शून्य पर आ गया। लेकिन अॅनलाॅक होने के बाद लगातार इसमें इजाफा हो रहा है तथा जहाॅं हफ्ते महिनों में कभी कोई संक्रमित मिलता था उसके स्थान पर प्रत्येक दिन 1-2 संक्रमित शहर में बढ रहे हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं प्रशासन की सही नीति का नहीं होना ही है।

महामारी से उठाना पड रहा बडा नुकसान

कोरोना महामारी का दौर जब प्रारंभ हुआ तब ग्रीष्म ऋतु की शुरूआत हुई थी यह ऐसा दोर था जब कुछ दिनों बाद ही शुभमुहुर्त के साथ मांगलिक कार्य हुआ करते हैं। इन्हीं मार्च से मई की स्कूली छुट्टीयों में परिवार घुमने जाया करते थे, इलेक्ट्रानिक सामग्रीयों की बडी खपत होती थी, वाहनों की भी खूब बिक्री होती थी। लेकिन महामारी ने पुरे देश का व्यापार चैपट कर दिया। मांगलिक कार्य भी डरते-डरते कम संख्या में हो रहे हैं। इसी प्रकार हर प्रकार के धार्मिक त्यौहारों से लोगों की दूरी बना दी गई। किसी भी प्रकार के आयोजनों पर रोक लगा दी गई। लाॅक डाउन और महामारी का सबसे ज्यादा प्रभाव यदि किसी पर पडा तो व्यापार के साथ-साथ देश के उद्योगों पर। आलम यह है कि लाॅकडाउन के पहले बिना किसी परेशानी के चल रहे उद्योग अपना उत्पादन इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वैश्विक बाजार में मांग ही नहीं है। जिसके चलते उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों को पर भी इसकी मार पड रही है। नागदा शहर भी इससे अछुता नहीं है। श्रमिक रोजगार के लिए जद्दोजहद करते दिखाई दे रहे है, और इन सबके बीच सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे हैं।

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