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-महावीर जयंती पर विशेष-

गया।जैन धर्मावलंबियों के अंतिम एवं 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के 2620 वां जन्म कल्याणक महोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए जीबीएम कॉलेज के अंग्रेजी विभाग की सहायक प्राध्यापिका सह साहित्यकार डॉ कुमारी रश्मि प्रियदर्शनी ने बताया कि चैत्र की शुक्ल त्रयोदशी को महावीर जयंती के नाम से मनाया जाता है।जिसका मुख्योद्देश्य होता है भगवान वर्धमान महावीर द्वारा बताए गए सत्य और अहिंसा के संदेश की स्मृतियों को एक बार पुनः मानसपटल पर तरोताजा कर देना। एक राज परिवार के कुलदीपक होकर भी भगवान वर्धमान ने ही महात्मा बुद्ब की तरह महज 30 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्ति के लिए घर-परिवार राजपाट, धन- वैभव,सुख सुविधाओं का परित्याग कर लोगों को सत्य अहिंसा और प्रेम के मार्ग का अनुसरण करने को अनुप्राणित किया।

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आजीवन क्षमाशीलता की प्रतिमूर्ति बन कर रहे तीर्थंकर महावीर ने समाज में फैले ढोंग, पाखंड, अत्याचार अनाचार और हिंसा के प्रति विरोध जताते हुए जनमानस को प्रेम और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित किया। वे भोग-विलास, मदिरापान, पशु हिंसा के सख्त खिलाफ थे।आज जब हम सड़कों के किनारे अवस्थित दुकानों में खुल्लम खुल्ला बकरों का कटा शरीर लटकता पाते हैं, लोगों का भोजन बनने का दुर्भाग्य झेलती तड़पती हुई मछलियों को मरते तथा सारी दुनिया को अपनी कुकडू-कूं से जगाने वाली निरीह मुर्गे मुर्गियों को हलाल होते देखते हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि मनुष्यो ने अपनी रसोई को श्मशान घाट जैसा तथा उदर को कब्रिस्ताननुमा बना डाला है?इसके अलावा आज भी कुछ लोग बिना सोचे समझे देवी देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य बेजुबान पशु पक्षियों की बलि तक देते नहीं हिचकते हैं।

भगवान महावीर खान-पान रहन-सहन आचार- विचार में अहिंसा के हिमायती थे,तथा बलि प्रथा के कटु आलोचक। बलि प्रथा ने तो भगवान महावीर के समय धर्म के रुप को पूर्णतया विकृत कर डाला था, जिसकी आजीवन उन्होंने भर्त्सना की थी, जीवन की कृत्रिम ता उन्हें बिल्कुल असहनीय थी, इसलिए तो उन्होंने वस्त्र तक का परित्याग कर दिगंबर रहना उपयुक्त समझा। वर्धमान ने समाज को अपरिग्रह, अनेकांतवाद जैसे बहुमूल्य दर्शन दिए तथा कर्मवाद को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जांचने परखने का कार्य किया।

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आज भी भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुगमन करने वालों के जीवन में अनुशासन की अनोखी झांकी देखी जा सकती है, जो सफलता का प्रथम सोपान है।आज जबकि हमारे समाज में मारकाट,हिंसा, अत्याचार, लूटपाट और उत्पात, और कोरोना जैसे विध्वंसकारी आपदा का बोलबाला है, भगवान महावीर द्वारा बताए गए सिद्धांत आज वर्तमान परिपेक्ष्य में विश्व को विनाश-लीला से बचाने सकने में पूरी तरह समर्थ सिद्ध हो सकता है। भगवान महावीर के उपदेश आज हम सबो के लिए प्रासंगिक हैं।

डॉ कुमारी रश्मि प्रियदर्शनी

सहायक प्राध्यापिका
अंग्रेजी विभाग
गौतम बुद्ध महिला महाविद्यालय,गया

गया से अश्वनी कुमार की रिपोर्ट

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