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लेखिका ÷निवेदिता मुकुल सक्सेना झाबुआ

      भारत वर्ष एक देवीय पृष्ठभूमि की सार्थकता सिद्ध करती आयी हैं। जहाँ”वेदो से विज्ञान “और परमार्थ का अटूट नाता रहा हैं। कहना गलत नही होगा की भारत मे वेद,पुराण,गीता रामायण आदि की महिमा जीवन जीने का सही मकसद तथ्यों के साथ सिखाती हैं वही विज्ञान की सटीकता को भी सार्थक करती हैं।जीवन का सत्व इन सब में  समाहित हैं। ये हर भारतीय की रग रग मे कभी बसा हुआ करता था। साथ ही इनको समझते हुये सभी कर्मशीलता के आत्मनिर्भर जीवन जीया करते थे।

चहुँ और स्वस्थ समृद्ध विकास तब चाहे नारी शिक्षा हो या पुरुष समानता व्याप्त थी हा ये बात जरुर हैं की, सभी के कार्य निश्चित थे तभी पारिवरिक समाजिक संरचना स्वस्थ कार्यो को अपने अपने दायरों मे सफलतम परिणामों फलीभूत करता रहा। जब एश्वर्य व सम्पन्नता राग ,द्वेष,जलन व छ्ल कपट को जन्म देता हैं ।ऐसा ही कुछ भारत की तकदीर मे  लिखा जा रहा था। जब भारत सम्पन्नता की गाथा लिख रहा था तब यूरोपियन जंगलो मे मोगली की तरह अस्थाई व खानाबदोश जिंदगी जीया करते थे।

    फिर कुछ लोग(यूरोपियन) समुद्री मार्ग का किनारा तलाशते तलाशते अँग्रेजो ने भारतभूमि पर प्रवेश किया और यहाँ की वैभव व सम्पन्नता देख आँखे चौंधिया गयी। तब से सफर शुरु हुआ भारत के लोगो की कमजोरी तलाशने का जिससे इनकी समृद्धता मे सेंध मारी जा सके खैर, आसान भी था  । अपने ही खेमो मे कंस, ध्रतराष्ट्र, विभीषण व्यापकता से मौजुद रहते हैं , ये तो फिर भी सिद्धान्तवादी थे लेकिन ये घुसपेठिये दमनकारी व फुट डालो राज्य करो की निति समर्थक थे।

    वही भारतीय संस्कति को विलोपित करने का भरपूर प्रयास किया कही वही अर्धज्ञान  युक्त   पाश्चात्य सभ्यता  व संस्कारों का भारत वर्ष मे जन्म होता गया। भारतीय संस्कृति व संस्कार  को ठेस पहुचाता सबरीमला मन्दिर की पवित्रता को भंग करने का  उदाहरण देखने को मिला ही था।

           अन्ग्रेजो ने यह भी देखा यहा की जनता भोली भाली है अत: जनता को कयी गुटो मे बांटा जा सकता हैं व पक्षपात का भाव अंकुरित करना शुरु किया। पुर्व मे एक ब्रिटिश महानुभव द्वारा एक बात कही गयी “भारत के लोग राज्य करने के लिये नही वरन गुलामी करने के लिए है “।

         अब तो बात सिर्फ फुट डालने की नही वरन भारत वर्ष को गुलामी करवाने व यहा राज्य करने की थी। संघर्ष शुरु हुआ जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद  कहे तो अप्रत्यक्ष स्वतन्त्रता प्राप्त के बाद  से अब तक  गुलामी का सफर रुका नही,और  ये भी सत्य है की,जीत सत्य ही होती हैं।और घोर कलयुग से सतयुग की वापसी होना ही हैं अभी नही देर से ही सही। हालाकि स्वछ्ता अभियान का दौर जारी हैं बस कचरा छंटाई होगी ही चाहे पक्ष हो या विपक्ष ।

       इसमे कोई दोराय नही की सैकडो “वामपंथी विचारधारा के समर्थक “अपने बहरूपिये के रुप मे तीव्रता से भारतीय जनता को विभ्रमीत करने मे कोई कसर नही छोड रहे ये भी सत्य हैं की इतने वामपंथीयो को मौके भी चुन चुन कर भारतीय लोगो ने ही ताज पोशियो के साथ इन्हे  मौके प्रदान किये चाहे कारण स्वतन्त्रता प्राप्त के बाद वामपंथी गेंग का विस्तार हुआ । तभी से जे एन यू जैसी कयी संस्थाए विकसित होती गयी बाद मे यही जे एंन यू “द्वारा टुकडा टुकडा गेंग”हो या “अभिव्यक्ति की आजादी” के नाम पर  भारत की दरियादली के साथ गंदी राजनीती करना व दमनकारी निति से

    काली अन्धेरी रात मे चमकता चांद भी रोशनी देता हैं जो सुर्य के उजाला होने तक सभी को चलने जीतना प्रकाश तो दे ही देता हैं । लेकिन चाँद अकेला ही होता हैं।

       वही हाल वर्तमान राजनिति व भारत की विडंबना का हैं।शायद इसी उम्मीद से की कभी तो सवेरा होगा। न्यायपक्ष सत्य का विद्रोह सदा होता आया हैं। बिल्कुल वैसे ही वर्तमान मे आक्रोश पनप रहा जो जनता के मध्य अलगाव की स्थिति को उत्पन्न करना चाह रहा है, पर विडंबना मानव ं”मस्तिष्क की हम अब भी गुलाम हैं “कभी तो हम  समझेगे की  ये  चरण अब स्पष्टतः जनता के मध्य आ चका। और जल्द ही इसके परिणाम ” मॉब लिचिंग ” के रुप मे आ रहे जो सरासर गलत हैं। यहा जीस विद्रोह को “राष्ट्रवादी “आराम से रोक सकते है वह स्वयं को मुकदर्शक का  रुप देकर संशय वेदना के भागी बन रहे।

        बात सिर्फ राष्ट्रहित की मंशा से बनी योजनाओं को खत्म करने की कोशिश “विद्रोह आँदोलन धरना-प्रदर्शन “आदि द्वारा विकास को रोकने की कोशिश जारी हैं। या फिर जनता को ये समझाना की मौजुदा सरकार ठीक नही कर रही अब बात चाहे नोटबंदी की हो या   “सी ए ए” की हो या “जी एस टी” लागू होने की ये सभी मुद्दे कही ना कही एक स्वस्थ समाजिक ,आर्थिक राष्ट्रिय व्यवस्था को बनाये रखने के लिये लाई गयी लेकिन स्वाभाविक सी बात हैं भ्रष्टाचार में लिप्त ये लोग क्यु अब तक की “काली कमाई” को खत्म करेँगे या उजगार करेँगे यही कारण हैं इन सभी नये कानून को ना मानने के लिये बाध्य भी जनता को इन्ही लोगो द्वारा किया जा रहा है।

   फिलहाल, अब  जब लग रहा की इन कानूनो को ना मानने की अपेक्षा बेहतर जरिया धरना ,आन्दोलन , तौड फौड रेली है तो खुराफाती दिमाग विकास के लिये बने कानून की उपेक्षा करना व  अन्य्ंत्र आँदोलनो का सहारा लेकर नवीन विकासात्मक कानून की उपेक्षा करना।

“जी एस टी “को ना मानना या नोट बंदी, फिर अभिव्यक्ति की आजादी, ओर हाल ही मे किसानो को भड़काने या पैट्रोल डीजल की कीमत पर हंगामा करना व किसान आँदोलन जारी रखने का खुराफाती दिमाग आखिर कब तक झुठा का राग अलापते रहेंगे ।

    एक खँडहर को महल मे तब्दील करने मे समय लगता हैं बिल्कुल वैसे जैसे पौधे की जड मे लगा रोग हटाना।

    वही वर्तमान सरकार मे पल रहे नेता मन्त्री भी अवसरवादीता का चोला पहने हैं और कयी तो सिस्टम को पुर्णत: खोखला कर चुके हा स्वयं के पोषण का विस्तार जरुर हुआ उनमे राष्ट्रवाद कही खौ गया।

        बहरहाल पुरा विश्व जहा कोरोना से लड़ रहा वही भारत सरकार द्वारा सुरक्षा हेतू कयी सार्थक कार्य किये गये  जैसे कोरोना टिके का निर्माण से लेकर   चिकित्सकीय सुविधा उप्लब्ध कराना जो वर्तमान मे बढी चुनौती है भविष्य को लेकर।

  जिम्मेदारी हमारी”

  “राष्ट्रहितम सर्वोपरी “सभी का उददेश्य समाहित हो। ये सिर्फ जनता की जिम्मेदारी नही वरन सभी नेता ओर मंत्रियो को भी “राष्ट्रवाद” को आत्मसात करना जरूरी हैं।


रिपोटर चंद्रकांत सी पूजारी

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