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उज्जैन। संस्कृत वाङ्मय की बहुत समृद्ध परंपरा है। इसीलिए यूनेस्को ने संस्कृत भाषा में लिखे ऋग्वेद को दुनिया का सबसे पहला हस्त लिखित प्रामाणिक ग्रंथ माना है। भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत भाषा विश्व की सबसे विकसित भाषा है।

यह बात संस्कृत भारती मालवा के प्रांत सहमंत्री एवं संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान नई दिल्ली की अखिल भारतीय पांडुग्रंथ संरक्षण परिषद् के सदस्य डॉ. हेमंत हिम्मतलाल शर्मा ने संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान नईदिल्ली के पांडुग्रंथ संरक्षण परिषद् की ऑनलाइन संगोष्ठी में संस्कृत के शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कही।

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उन्होंने  कहा कि संस्कृत में शोध कार्य के लिए एक बहुत बड़ा क्षेत्र हस्त लिखित पांडुलिपि ग्रंथों का है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अनुसार देश में लगभग 45 लाख संस्कृत पांडुलिपि के ग्रंथ अभी भी अपने पाठ संपादन का इंतजार कर रहे हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के 22.16 के अनुसार संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ- साथ पांडुलिपि ग्रंथों का संकलन, परिशोधन एवं पाठ संपादन देश के पारंपरिक विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और अनुसंधान केंद्रों के माध्यम से कार्य करने की महती आवश्यकता है।

इस कार्य को करने के लिए पारंपरिक संस्थाओं को एक निश्चित प्रतिशत में अपने शोधार्थी देने होंगे। जिससे कि वर्षों से उपेक्षित इस क्षेत्र में शीघ्र और त्वरित गति से व्यापक स्तर पर काम किया जा सके। भारतीय नवीन ज्ञान, विज्ञान इन ग्रंथों में है। इस कार्य के लिए नवीन युवाओं का समूह बनाकर प्रशिक्षण देकर शोध कार्य की दिशा में काम करना होगा।

देश में आज इस विधा को जानने वाले विद्वान अंगुलीगण्य हैं। इन मनीषियों के मार्गदर्शन में युवाओं को इकट्ठा करके इस शोध प्रविधि का ज्ञान लेकर इस क्षेत्र में बड़ा काम कर सकते हैं।

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सभी पारंपरिक विश्व विद्यालय शोध संस्थान और महाविद्यालय इस दिशा में निरंतर और योजनाबद्ध तरीके से 10 वर्ष भी काम कर ले तो लाखों पांडुलिपि ग्रंथों का पाठ संपादन कर हम नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं। इसके लिए संस्कृत वाङ्मय में शोध कार्य के लिए पांडुलिपि ग्रंथों के पाठ संपादन की अनिवार्यता निर्धारित की जाए। इस कार्य के लिए लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी प्रतिवर्ष पांडुलिपि ग्रंथ के पाठ संपादन के लिए निर्धारित करने होंगे।

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