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बावनगजा। 31 जनवरी। दिगम्बर मुनिराज जिनके पास न घर है न गाड़ी, जिनके पास न मकान है न  सम्पत्ति इसलिए उन्हें किसी बात की चिंता नहीं होती है। मुनिराज का जीवन चिंता में नहीं चिंतन में व्यतीत होता है, आप क्यों चिंता में हो।

अच्छा कुल मिला, मनुष्य पर्याय मिली धन, संपत्ति मिली फिर भी चिंता करते हो। प्रभु की भक्ति करो, गुरु की सेवा करो, चिंता नहीं चिंतन करो। गुरु उपदेश देते हैं, शिक्षा देते हैं चिंता नहीं, आप भी चिंतन करो कर्म नष्ट होंगे और कर्म नष्ट होंगे तो सुख स्वयं ही मिल जाएगा, इसलिए हमेशा गुरु के सान्निध्य में रहो, खुश रहो, क्योंकि जिनके साथ रहोगे उनका प्रभाव पडे़गा। मुनिराज की कठिनचर्या देखकर आपका भी आचरण सुधरेगा।

छोटी सोच और पैर की मोच व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ने देती है। चिंता करने वालों का साथ छोड़ कर चिंतन करने वालों के साथ रहो। अर्थात् गुरु के सान्निध्य में रहो, चिंता मुक्त हो जाओगे। धन्य है दिगम्बर मुनिराज जो ज्ञान, ध्यान और चिंतन में लीन रहते हैं चिंतन करने वालों के साथ नहीं चिंतन करने वालों के साथ रहो।

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चिंता है तो नींद नहीं आती है क्योंकि हो रही है चिंता। किसकी चिंता, और कितनी चिंता, कैसी चिंता। और जिसने ईमानदारी से पैसा कमाया है, चोरी नहीं की है, किसी के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया उसे किस चीज की चिंता। आप कितनी ही चिंता करो, कितने ही रोओ पर कर्म के आगे किसी की चलती नहीं है।

दिगम्बर साधु की चर्या कितनी कठिन होती है। सब चीजों में कंजूसी करना, बर्तन खरीदने में भी कंजूसी करना कपड़े क्रय करने में कंजूसी करना पर कभी भी गुरु को आहार देने-दिलाने में कंजूसी नहीं करना।

जिसका खान-पान सही नहीं है और जिसका खान-दान सही नहीं है वह आहार दान देने का पात्र नहीं है। नवधाभक्ति से मुनिराज को आहार दिया जाता है। नवधा भक्ति में इस प्रथम भक्ति है पड़गाहन। मुनिराज को लौंग बादाम और फलों से पड़गाया जाता है। आहार करते समय अंतराय का पालन मुनिराज करते हैं। 24 घंटे में एक बार आहर पानी लेना कठिन मुनिराज की चर्या होती है।


ये प्रवचन रविवार को  बावनगजा की त्रिदिवसीय यात्रा-बंदना के अंतिम दिन एक क धर्मसाभा को संबोधित करते हुए आचार्य विमदसागर जी मुनिराज ने दिये। संघस्थ श्री अनिल जी ने विद्वत् परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन मुनज को बताया कि आचार्य श्री के सान्निध्य में  अनेकों स्थानों के श्रद्धालुओं ने तीर्थ की वंदना की, लाडू चढ़ाया और 64 ऋद्धि विधान किया।

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