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प्रशासन अचल संपत्तियों के नामांतरण एवं डायवर्शन की प्रक्रिया का सरलीकरण करे

 

नागदा जं. निप्र। अनुविभागीय अधिकारी आशुतोष गोस्वामी द्वारा कृषि भूमि पर प्लाॅट काट कर विक्रय करने वालों के विरूद्ध जांच प्रक्रिया को प्रारंभ कर दिया है। प्रशासन की जांच से किसी को भी गूरेज नहीं लेकिन स्थानिय प्रशासनिक अधिकारियों को इस और भी ध्यान देना चाहिए कि आखिर क्यों नागरिक नामांतरण एवं डायवर्शन की प्रक्रिया को नहीं अपनाते है ? इस पुरे मामले में जो मुख्य बात निकल कर सामने आई है वह राजस्व विभाग की लेतलाली एवं प्रक्रिया में लगने वाला अत्यधिक धन एवं समय।

किसी भी नागरिक को यदि अपनी कृषि, रहवासी अथवा व्यवसायिक भूमि का नामांतरण एवं डायवर्शन करवाना आसान नहीं होता। प्रक्रिया भले ही बहुत छोटी होती है लेकिन इसे करने वाले काफी असंवेदनशील होते है। जिसके कारण शासन को राजस्व का भी नुकसान हो रहा है तथा नियमों का पालन भी नहंी हो पा रहा है।


नामांतरण एवं डायवर्शन की प्रक्रिया में लगता है अत्यधिक समय एवं पैसा
मामले में हमारे प्रतिनिधि को कई भूखण्ड स्वामी ने बताया कि कृषि भूमि को रहवासी भूमि में डायवर्ट अथवा व्यय परिवर्तन करवाने में एक आम इंसान को काफी मशक्कत करना पडती है।

नामांतरण की प्रक्रिया होती बहूत सरल है लेकिन पटवारी, गिरधावर एवं तहसील कार्यालय के चक्कर लगा-लगा कर आवेदक परेशान हो जाते है। इसी प्रकार प्रत्येक भूखण्ड स्वामी अपने प्लाॅट का डायवर्शन करवाना चाहता है लेकिन यहाॅं पर भी वहीं स्थिति उत्पन्न होती है कि राजस्व विभाग के अधिकारी बिना लाभ-शुभ के किसी भी नागरिक का कार्य नहीं करते है।

ऐसे में प्रशासन को चाहिए कि नामांतरण एवं डायवर्शन की प्रक्रिया का सरलीकरण करते हुए इसे समयसीमा में बांधना चाहिए। जिससे की आम नागरिक भी इसका लाभ ले सके। इस पुरे घटनाक्रम से दो फायदे होंगे एक तो नागरिकगण अपनी अचल संपत्ति को सुरक्षित रूप से दस्तावेजों में दर्ज करवा सकेंगे साथ ही शासन को भी राजस्व प्राप्त हो सकेगा।


नियमों एवं प्रक्रिया का बोर्ड तहसील में लगे


  स्थानिय प्रशासनिक अधिकारियों को इस और भी ध्यान देना चाहिए कि भूमि के नामांतरण एवं डायवर्शन की संपूर्ण प्रक्रिया की जानकारी तहसील कार्यालय से ही मिल सके। जिससे की नियमों की जानकारी प्राप्त कर नागरिकगण उसका लाभ प्राप्त सकें।

अमूमन देखा गया है कि राजस्व विभाग के अधिकारी जिसमें पटवारी, गिरधावर एवं तहसील कार्यालय द्वारा आवेदकों को महिनों-महिनों चक्कर लगवाऐं जाते हैं जिससे परेशान होकर नागरिकगण अपने प्लाॅट, भूमि का नामांतरण, डायवर्शन नहीं करवा रहे है। प्रशासन को चाहिए कि पहले अपनी प्रक्रिया को सरल बनाऐ उसके बाद ही क्षेत्र में इस प्रकार की सख्ती करना चाहिए। प्रक्रिया का सरलीकरण होने पर हर व्यक्ति इसको अपनाने में पिछे नहीं रहेगा।


शासकीय भूमियों पर कब्जेधारियों पर प्रशासन क्यों मेहरबान ?


प्रशासन द्वारा कृषि भूमियों के क्रय-विक्रय के बाद नामांतरण, डायवर्शन आदि नहीं करवाने के मामले में सख्ती जरूर की गई है लेकिन शहर के नागरिकों में इस बात को लेकर भी काफी चर्चा है कि प्रशासन उन शासकीय भूमियों से अवैधानिक कब्जा क्यों नहीं हटवाता है जिन पर रसूखदारों का अवैधानिक कब्जा है। मामले में तो यहाॅं तक जानकारी लगी है कि जवाहर मार्ग बस स्टेण्ड क्षेत्र की शासकीय भूमि पर एक रसूखदार व्यक्ति ने अपना कब्जा जमा रखा है। जिसको लेकर प्रशासन अपनी कार्रवाई में पीछे है। स्थानिय अधिकारियों को इस दिशा में भी कार्रवाई करना चाहिए।


नामांतरण में ही छिन लेते हैं 5 से 7 हजार


कृषि भूमि, प्लाॅट के क्रेताओं द्वारा हमारे प्रतिनिधि से चर्चा में बताया कि भूमि के क्रय करने के बाद नामांतरण की प्रक्रिया में काफी समय लगता है। इतना नहीं गिरधावर एवं पटवारी द्वारा नामांतरण के नाम पर 5 से 7 हजार रूपये की मांग तक की जाती है। नहीं देने पर महिनों चक्कर लगवाऐ जाते है। जिससे थक हार कर भूमि स्वामी को पैसा देना ही होता है।

ऐसे में भूमि के क्रय (रजिस्ट्री) में जितना पैसा नहीं लगता उससे अधिक तो राजस्व विभाग के नामांतरण में लग जाते है। इसी प्रकार भूमि के सीमांकन के भी यही हालात है महिनों एवं वर्षो में भी भूमि का सीमांकन राजस्व विभाग द्वारा नहीं किया जाता है। फौती नामांतरण नियमानुसार विभाग को स्वयं ही करना चाहिए लेकिन वह भी नहीं हो पा रहा है।

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