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त्रिगुणात्मक शक्तियों के सहज अनुभव का माध्यम सहज योग

 

 

हम सभी जानते हैं और सभी धर्म एक तथ्य पर एक मत हो सकते हैं कि सृष्टि का सृजन एक शक्ति से हुआ, जिसे हम परमात्मा अथवा परम पिता के रूप में स्वीकार करते हैं। परमात्मा एक है और वही अनेक भी है उनकी शक्ति भी एक ही है परंतु उनके अनेक स्वरूप हैं।
परमपिता व उनकी शक्ति ने इस सृष्टि, जो कि अनेकानेक ब्रह्मांडो को स्वयं में समेटे हुए है के सृजन की आवश्यकता अनुसार विभिन्न स्वरूप धारण किए। सृजन के सत्य को समझना अत्यंत कठिन कार्य है जब तक हम परम सत्य को नहीं समझ सकते तब तक परमात्मा की शक्तियों का साक्षात् लगभग असंभव कार्य है। हम उनकी चर्चा ही कर सकते हैं परंतु अनुभव तभी कर सकते हैं जब हमारा तारतम्य उस परम शक्ति के साथ होता है।
भारतवर्ष में सहस्त्रों वर्षों से अनेक महापुरुष, संत, व अवतरण हुए जिन्होंने सत्य को पहचाना व प्राप्त किया, परंतु यह सत्य सर्वसाधारण तक नहीं पहुंच सका। *वर्तमान में श्री माताजी निर्मला देवी जी ने अपने अवतरण द्वारा इस सत्य को कुंडलिनी जागरण व सहज योग ध्यान के माध्यम से सर्वसाधारण के लिए सुलभ कर दिया है।*
श्री माताजी ने स्वयं परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों व शक्तियों का वर्णन अपनी अमृतवाणी में कुछ इस प्रकार किया है कि,
“आज मैं आपको तीन शक्तियों के बारे में बताना चाहती हूँ कि परमेश्वर एक ही हैं। वो दो नहीं हैं, अनेक हैं । मैं एक ही हूँ, अनेक नहीं हूँ। लेकिन आपकी माताजी हूँ — मेंरे पति की पत्नी हूँ मेंरे बच्चों की माँ हूँ, आपकी अलौकिक माँ हूँ, उनकी लौकिक माँ हूँ। इसी तरह परमात्मा के भी तीन अंदाज हैं, थ्री आसपेक्ट्स (three aspects) हैं । पहले अंदाज से वो साक्षिस्वरूप हैं। वो साक्षी हैं अपनी शक्ति (Shakti) के खेल के, जिसे वो देखते हैं। उसे हम ईश्वर कहते हैं। और उनकी शक्ति को हम ईश्वरीय शक्ति कहते हैं या ईश्वरी कहते हैं। हमारे सहजयोग में उसे हम महाकाली की शक्ति कहते हैं। जिस वक्त उनका ये साक्षी स्वरूपत्व खत्म होता है माने जब वो और कुछ देखना नहीं चाहते, वो नापसन्द करते हैं जब वो अपनी आँख मूँद लेते हैं अपनी शक्ति के खेल से, उस वक्त सब चीज़ खत्म हो जाती है। इसलिये उस शक्ति को हम लोग संहारक शक्ति कहते हैं। असल में संहारक नहीं है। लेकिन वो सारे संसार के कार्य का नियोजन करती है और उसे खत्म करती है।
दूसरी शक्ति जो परमात्मा उपयोग में लाते हैं, वो है उनकी सृजनात्मक शक्ति जिससे वो सारे संसार की रचना करते हैं। उसमे बड़े-बड़े ग्रह-तारे निर्मित होते हैं, जिससे वो पृथ्वी की एक परम पवित्र वस्तु तैयार होती हे। इस अवस्था में परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं और उनकी शक्ति को हिरण्यगर्भिणी कहते हैं। हमारे सहजयोग में उसको महासरस्वती कहते हैं।
तीसरी परमात्मा की जो शक्ति है वो विराट्‌ स्वरूप है, विराट्‌ शक्ति है। जिस शक्ति के द्वारा संसार में जीव पैदा होते हैं, उनकी उत्क्रांति याने एवोलूशन (evolution) होता है। जानवर से मानव बनता है और मानव से अति मानव बनता है और अति मानव से परमात्मा बनता है। इस विराट्‌ शक्ति को सहजयोग में हम लोग महालक्ष्मी कहते हैं। इस तरह से संसार में तीन शक्तियाँ हैं जो परमेश्वर अपनी आभा को फैलाते हैं। पहली शक्ति जिसे ईश्वरी शक्ति कहना चाहिए, दूसरी हिरण्यगर्भिणी और तीसरी विराटांगना।”
                     ( 21/1/1975, मुम्बई )
     मनुष्य परमात्मा की ही एक छवि है अतः उसे भी सारी शक्तियां प्रदान की गई हैं, जो सामान्यतः सुप्त अवस्था में रहती हैं। व हम बिना समझे वो जाने उन्हें  अनभिज्ञता में ही प्रदर्शित करते रहते हैं। वह शक्ति जिससे मनुष्य में इच्छा उत्पन्न होती है बांई और स्थित महाकाली की शक्ति है। इस इच्छा की प्रेरणा से जो भविष्य की योजनाएं व उनकी पूर्ति के लिए क्रियाएं है वह महासरस्वती की शक्ति है। जो मनुष्य के दाएं भाग का प्रतिनिधित्व करती है जिस शक्ति के द्वारा मनुष्य में ज्ञान का संचार होता है उसकी उत्क्रांति होती है वह मनुष्य के मध्य भाग में स्थित महालक्ष्मी की शक्ति होती है। इन तीनों शक्तियों का विलय सहस्त्रार में होता है जो आदि पुरुष सदाशिव का स्थान है।
         कुंडलिनी जागरण द्वारा आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने हेतु www.sahajayoga.org.in से जुड़ें । निशुल्क ध्यान प्रशिक्षण देने वाली यह वेब साइट देश-विदेश में आत्मसाक्षात्कार देने का कार्य लगातार कर रही है।

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