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दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन लगाने के बावजूद आखिर हम संक्रमण को थामने में सफल क्यों नहीं हो सके?
स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता भार साफ-साफ महसूस किया जा सकता है।

सरकारों की इसलिए आलोचना की जाती हो कि वे ‘देर से और नाकाफी’ कदम उठाती हैं, लेकिन लॉकडाउन संभवत: ‘बहुत जल्दी और अत्यधिक सख्ती’ से उठाया गया कदम माना जाएगा।आज भी यह सवाल खड़ा है कि क्या हमारी स्वास्थ्य-सेवाएं प्रतिदिन एक लाख नए संक्रमित मरीजों को संभाल पाने के लिए तैयार हैं? यह सच्चाई है कि ऑक्सीजन-आपूर्ति में आ रही कमी अब सुर्खियां बनने लगी हैं।

बेशक पिछले छह महीने में ऑक्सीजन-उत्पादन में लगभग चौगुना वृद्धि हुई है और ७५०  टन प्रतिदिन से बढ़कर २७०० टन रोजाना इसकी आपूर्ति हो रही है। फिर भी, मध्य प्रदेश, गुजरात और मुंबई की जमीनी हकीकत बताती है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों की ऑक्सीजन-आपूर्ति कम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, ताकि ऑक्सीजन बचाकर रखी जा सके यह सवाल उठता है कि दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन लगाने के बावजूद आखिर हम संक्रमण को थामने में सफल क्यों नहीं हो सके?

दरअसल, लॉकडाउन का मकसद महामारी के शुरुआती चरणों में मौत को रोकना और स्वास्थ्य ढांचे को महामारी के मुकाबले में तैयार करना था। यह तब लागू किया गया, जब संक्रमित मरीजों की संख्या काफी कम थी और मौत न के बराबर। उस वक्त देश भर में ६०६ मामले सामने आए थे, जिनमें से ५५३  एक्टिव केस थे और जान गंवाने वाले मरीजों की संख्या १० थी।

मगर लॉकडाउन में ज्यादा जोर कानून-व्यवस्था पर रहा और जोखिम कम करने व तैयारी पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। आलम यह है कि हम आज भी कोविड-१९  से बचने के लिए निगरानी और बचाव के उपायों को पूरी तरह से नहीं अपना रहे हैं, जो खासतौर से इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी तक हमने इसके खिलाफ कोई दवा या वैक्सीन तैयार नहीं की है।

अनुमान है कि कोरोना के १४ प्रतिशत संक्रमित मामले गंभीर होते हैं और उन्हें अस्पताल की जरूरत पड़ती है, जबकि पांच प्रतिशत मरीज बहुत गंभीर होते हैं और उन्हें आईसीयू में रखना पड़ सकता है। मौत चार प्रतिशत मरीजों की होती है। फिलहाल भारत में मृत्यु-दर दो फीसदी के नीचे है, जो तुलनात्मक रूप से बेहतर माना जाएगा।

मगर राज्यवार बात करें, तो पंजाब और महाराष्ट्र में यह चार प्रतिशत के करीब है।,  मृत्यु-दर को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से परे जाकर देखने की जरूरत है। और चूंकि यहां संक्रमण ग्रामीण इलाकों में फैलने लगा है, इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता भार साफ-साफ महसूस किया जा सकता है।

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