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आग नफरत की हरगिज लगाता नहीं,धर्म कोई भी लड़ना सिखाता नहीं-हमारे भारत देश के संबंध में कितनी प्रासंगिक है ये पंक्तियां! निःसंदेह सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को प्रेम,दया,करुणा, अहिंसा,पवित्रता आदि का पाठ पढ़ा कर हृदय में मानवता का संचार करें। धर्म का उद्देश्य निखिल विश्व के सुख और कल्याण की कामना के साथ व्यक्ति को सत्कर्मो के लिए निर्देशित करना होता है। भारत वर्ष प्राचीन समय से ही अनेक धर्मों का सुसंगम रहा है।हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,जैन, बौद्ध सभी धर्मो को मानने वाले लोग यहां मिल जुल कर रहते हैं।

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अपने भारत वर्ष की इसी धर्मनिरपेक्ष सर्व धर्म समभाव से अनुप्राणित सर्व कल्याणकारी संस्कृति का मंगलमय नजारा अप्रैल माह में आयोजित होने वाले पावन त्योहारों की अनोखी छंटा में देखा जा सकता है। इसी अप्रैल माह में बासंतिक नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, रामनवमी तथा हनुमान जयंती हिंदू धर्म,पवित्र रमजान माह की शुरुआत इस्लाम धर्म, वैशाखी सिख धर्म,गुड फ्राइडे ईसाई धर्म, बाबासाहेब बीआर अंबेडकर जयंती एवं सम्राट अशोक जयंती बौद्ध धर्म तथा महावीर जयंती जैन धर्म जैसे विभिन्न धर्मों के त्योहारों की सुंदर सी झांकी एक साथ देखी जा सकती है, जो विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है। हमारे देश की यही तो खूबसूरती है, जो हर हाल,हर परिस्थिति में बनी रही है,और आगे भी इसी भांति बनी रहनी चाहिए।भले ही रास्ते अलग-अलग हों परंतु मंजिल तो सबको उस परमसत्ता की कृपा प्राप्ति ही है। सभी स्वयं को उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर से जुड़कर अपने परिवार व समाज के कल्याण हेतु प्रार्थना करते हैं।


सभी धर्मावलंबी अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं से उत्प्रेरित होकर संबंधित त्योहारों को हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं, आपसी प्रेम,भाईचारे और एकत्व की मशाल जलाते हैं। मानव धर्म से बड़ा कुछ भी नहीं है का संदेश फैलाते हैं।इस क्षणभंगुर जीवन की सार्थकता भी तो तभी है,जब घृणा, ईर्ष्या,द्वेष, स्वार्थ, लोभ, मोह आदि जैसी दुर्भावनाओ का परित्याग कर अपने भीतर मानवीय मूल्यों का विकास किया जाए,दूसरों के दुःखों को कम करने का प्रयास किया जाए, तथा एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होकर “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का अनुगमन किया जाए। इस वर्ष भी अप्रैल महीने में इतने त्यौहार मनाए जाएंगे। इन त्योहारों के मनाने की सार्थकता तभी है जब हमारे देश और समाज की एकता समग्रता और अखंडता हमेशा अक्षुण और सुदृढ़ बनी रहे।

समाज को बांटने वाली स्वार्थ-संचालित संकीर्ण भावनाओं का विनाश हो और सर्वत्र सौहार्द और समन्वय का वातावरण बना रहे। ईश्वर के नाम भले ही अलग-अलग हो, उनकी कृपा पाने के लिए अपनाए गए धार्मिक विधि-विधान भी अलग- अलग हो, रीति रिवाज और परंपराएं भले ही भिन्न-भिन्न हो, किंतु यह बात सदैव स्मरण रहे कि हम सभी उसी एक ईश्वर की संताने हैं,जो सबका मालिक है, हमारा आदि और अंत सब उसी एक परमात्मा से है। हम हिंदू मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध, जैन आदि बाद में है। ये धर्म और जाति या तो मानव निर्मित है, ईश्वर ने तो बस हमें मनुष्य बनाया है। अटल सत्य है कि सर्वप्रथम हम कि सर्वप्रथम हम सभी मनुष्य है,अतएव मनुष्य धर्म से बड़ा हमारे लिए कोई धर्म नहीं होना चाहिए।

डॉ कुमारी रश्मि प्रियदर्शनी

असिस्टेंट प्रोफेसर

(अंग्रेजी विभाग)

गौतम बुद्ध महिला महाविद्यालय, गया
मगध विश्वविद्यालय (बोधगया)

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