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सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का पालन करें, शासन-प्रशासन परिसमापक-रवि राय


उज्जैन। सन 1996 में विधिवत बंद की गई विनोद मिल के श्रमिकों का बकाया 107 करोड रुपए का भुगतान फरवरी 2021 में शासन को करना है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2019 में आदेश जारी किए गए। वर्तमान में शासन प्रशासन द्वारा मिल्स की भूमि को विक्रय के पूर्व की प्रक्रिया जारी है।


शहर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रवि राय ने कहा कि शासन-प्रशासन उतनी ही जमीन विक्रय करें जितनी कि विनोद मिल कंपनी को तत्कालीन ग्वालियर राज्य द्वारा लीज पर दी गई थी।

रवि राय ने कहा कि जो प्रक्रिया चल रही है उसमें कुल भूमि 18.0 18 है अर्थात (लगभग 90 बीघा) से अधिक। परंतु सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में ग्वालियर राज्य द्वारा पट्टे पर दी गई भूमि 80 बीघा प्रदर्शित की गई है। इसी क्रम में सन 1960 में कलेक्टर की नपती में उक्त भूमि को 86 बीघा बताया गया है।

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वर्तमान में 150 श्रमिक परिवार विनोद मिल की चाल में रहते हैं जो सभी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार है जिन्हें बंद मील कंपनी से लाखों रुपए लेना शेष है। वर्तमान में उनकी छत छीन जाने एवं बेघर हो जाने का संकट सामने हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा उन्हें आश्वस्त किया गया कि उन्हें वहीं रहने दिया जावेगा। इस संबंध में रवि राय ने कहा है कि शासन प्रशासन परिसमापक संयुक्त रूप से लीज पर दी गई भूमि जिस पर जिस भूमि पर कारखाना था उसे ही विक्रय करें शेष भूमि जो कि लगभग 5 से 10 बीधा है उसे गरीब मजदूरों जो निवासरत है उनके लिए सुरक्षित रखें जिससे मुख्यमंत्री द्वारा कई बार की गई घोषणा भी पूर्ण हो जावेगी और श्रमिकों के घर भी बच जावेंगे।

रवि राय ने कहा कि इस संबंध में तत्कालीन मंत्री मंडल कमलनाथ सरकार द्वारा 19 फरवरी 2020 को निर्णय लिया गया था कि कि मजदूरों के बकाया भुगतान हेतु 6 हेक्टेयर भूमि लगभग (30 बीघा) को बेचा जावे उसका भी पालन शासन प्रशासन को करना चाहिए।

रवि राय ने कहा कि इस संबंध में मध्य प्रदेश के प्रमुख राजस्व आयुक्त भोपाल, मुख्य महाप्रबंधक लोक संपत्ति परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग भोपाल, कलेक्टर उज्जैन, नजूल अधिकारी उज्जैन से विधिवत चर्चा कर उच्च न्यायालय के निर्णय की प्रति के साथ ज्ञापन प्रस्तुत किया है।

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मजदूरों के हित में लीज पर दी गई भूमि को ही बेचा जाए शेष अधिक भूमि को नहीं बेचा जाए जिससे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन भी हो और किसी प्रकार की उच्चतम न्यायालय की अवमानना ना हो।

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